Call Now : +91 9810529269

 

Gallery 1

स्वर्णकारों के गौत्र
आपने गौत्र शब्द तो सुना होगा, गौत्र शब्द का अर्थ है वंश। गौत्रों का नामकरण ऋषियों एवं मुनियों के नाम पर किया गया है। गौत्र प्रणाली का मुख्य उद्देश्य व्याक्ति का उसके पूर्वजों के साथ जोड़ना है। स्वर्णकारों के आदि पुरूष महाराज अजमीढ़ गुरूकुल शिक्षा प्रणाली के आधार पर अपने शिष्यों को स्वर्णकला की शिक्षा देते थे। उनके मतानुसार यह शिक्षा शान्ति के समय श्रृंगार एव युद्ध के समय अंगार का रूप बने अर्थात् स्वर्णकाल के साथ अस्त्र-शस्त्र विद्या का होना भी अनिवार्य है, अत: ये लोग क्षत्रिय शिक्षा के आधार पर मैढ क्षत्रिय कहलाए। सभी योग्य क्षत्रिय छात्र महाराज अजमीढ़ शिक्षा केन्द्रों मे शिक्षित होने पर अपने आपको मैढ़ क्षत्रिय या मैढ़ स्वर्णकारों के नाम से सम्बोधित कराने लगे। यही कारण है कि मैढ क्षत्रियों में गौत्रों की संख्या अन्य सभी जातियों से बहुत ही अधिक है। कुछ गौत्रों के नाम स्थानों (गांवों) एवं खांपों के
नाम पर भी प्रचलित हुए। बहुत से गौत्र प्रान्तीेय बोली में उच्चारण के कारण अपभ्रंश हो गए।

जहां तक गौत्रों के महत्वं का प्रश्नो है यह मुख्य रूप से शादी के समय अहम भूमिका निभाता है क्योंकि एक ही गौत्र से सम्बन्धित लड़का और लड़की विवाह नहीं कर सकते। हमारी धार्मिक एवं पारिवारिक परम्पकराओं के अनुसार एक गौत्र के बच्चों का रिश्ता भाई-बहन का होता है। मुख्यत: स्वयं तथा माता का गौत्र छोड़कर विवाह सम्बन्ध बनाए जाते हैं, क्योंकि दोनों के पूर्वज एक ही होते हैं।

1 2 3 4 5